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Santoshi Mata Vrat Katha Complete

Language:
संतोषी माता व्रत कथा संपूर्ण
॥ श्री संतोषी माता व्रत कथा ॥ प्राचीन समय की बात है। एक वृद्धा के सात पुत्र थे। छह पुत्र कमाने वाले और धनवान थे, जबकि सबसे छोटा पुत्र अत्यंत सीधा-सादा और भोला था। उसकी पत्नी का नाम सावित्री था। सावित्री बहुत धर्मपरायण, पतिव्रता और सहनशील स्त्री थी। वह घर के सभी कार्य करती, फिर भी उसे परिवार में सम्मान नहीं मिलता था। छहों भाई अपनी पत्नियों के साथ सुखपूर्वक रहते थे, लेकिन सबसे छोटे पुत्र और उसकी पत्नी को हमेशा तिरस्कार सहना पड़ता था। भोजन के समय उन्हें बचा-खुचा भोजन दिया जाता। कई बार तो भूखे पेट ही सोना पड़ता। सावित्री सब कुछ सहन करती रही, लेकिन उसने कभी किसी से शिकायत नहीं की। एक दिन सबसे छोटे पुत्र ने अपनी पत्नी को रोते हुए देखा। उसने कारण पूछा तो सावित्री ने घर की सारी स्थिति बता दी। यह सुनकर वह अत्यंत दुखी हुआ और बोला — “मैं इस घर को छोड़कर बाहर जाकर काम करूँगा और धन कमाकर लाऊँगा।” अगले ही दिन वह दूसरे नगर चला गया। वहाँ उसने एक व्यापारी के यहाँ नौकरी कर ली। उसकी मेहनत और ईमानदारी से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ। धीरे-धीरे उसका व्यापार बढ़ने लगा और वह धनवान बन गया। लेकिन इधर घर में सावित्री की स्थिति और खराब हो गई। सास और जेठानियाँ उसे ताने देतीं और कठिन कार्य करवातीं। एक दिन सावित्री जंगल में लकड़ियाँ लेने गई। वहाँ उसने कुछ स्त्रियों को व्रत करते देखा। सभी स्त्रियाँ माता संतोषी की कथा सुन रही थीं। सावित्री ने विनम्रता से पूछा — “बहनों, आप कौन सा व्रत कर रही हैं?” स्त्रियों ने कहा — “यह संतोषी माता का व्रत है। जो स्त्री श्रद्धा और नियम से यह व्रत करती है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।” सावित्री ने व्रत की विधि पूछी। स्त्रियों ने बताया — “प्रत्येक शुक्रवार को स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। गुड़ और चने का भोग लगाएँ। संतोषी माता की कथा सुनें और खटाई का सेवन न करें। श्रद्धा और संतोष से व्रत करें।” सावित्री ने उसी दिन से व्रत आरंभ कर दिया। वह हर शुक्रवार को माता की पूजा करती, कथा सुनती और गुड़-चना का प्रसाद बाँटती। धीरे-धीरे उसके जीवन में परिवर्तन आने लगा। माता संतोषी उसकी भक्ति से प्रसन्न हो गईं। उधर उसका पति भी अपनी पत्नी को याद करने लगा। एक रात माता संतोषी ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और कहा — “तुम्हारी पत्नी बहुत दुख सह रही है। अब समय आ गया है कि तुम अपने घर लौट जाओ।” अगले ही दिन वह धन और वस्त्र लेकर घर के लिए चल पड़ा। जब वह घर पहुँचा तो सावित्री की दशा देखकर अत्यंत दुखी हुआ। उसने अपनी पत्नी को सम्मान दिया और अलग घर में रहने लगा। अब दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। कुछ समय बाद सावित्री ने उद्यापन करने का निश्चय किया। उसने आठ बालकों को भोजन के लिए बुलाया। लेकिन उसकी जेठानियों ने बच्चों को सिखा दिया कि भोजन में खटाई माँगना। बच्चों ने भोजन के समय खटाई माँगी। सावित्री ने नियम के कारण मना कर दिया, लेकिन बच्चों ने पैसे लेकर इमली खरीद ली। इससे माता संतोषी अप्रसन्न हो गईं। अचानक उसके पति को राजदरबार से बुलावा आया और उसे कैद कर लिया गया। घर में फिर दुख छा गया। सावित्री समझ गई कि उद्यापन में भूल हो गई है। वह रोते हुए माता के मंदिर गई और क्षमा माँगी। माता संतोषी प्रकट हुईं और बोलीं — “बेटी, व्रत में नियम का पालन बहुत आवश्यक है। अब पुनः विधिपूर्वक उद्यापन करो।” सावित्री ने दोबारा पूरे नियम और श्रद्धा से व्रत तथा उद्यापन किया। इस बार सब कुछ सही हुआ। माता अत्यंत प्रसन्न हुईं। उसके पति को कारागार से मुक्ति मिल गई और घर में सुख-समृद्धि लौट आई। धीरे-धीरे उनका परिवार धन, वैभव और संतान सुख से भर गया। पूरे नगर में माता संतोषी की महिमा फैल गई। सभी स्त्रियाँ श्रद्धा से शुक्रवार का व्रत करने लगीं। इस कथा से शिक्षा मिलती है कि संतोष, श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा अवश्य फल देती है। जो स्त्री सच्चे मन से संतोषी माता का व्रत करती है, उसके जीवन के दुख दूर होते हैं और घर में सुख-शांति आती है। ॥ व्रत विधि ॥ प्रत्येक शुक्रवार प्रातः स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र पहनें। लकड़ी के पट्टे पर लाल वस्त्र बिछाकर संतोषी माता की तस्वीर स्थापित करें। घी का दीपक जलाएँ। गुड़ और चने का भोग लगाएँ। कथा पढ़ें या सुनें। खटाई का सेवन न करें। अंत में माता की आरती करें और प्रसाद बाँटें। ॥ उद्यापन विधि ॥ सोलह शुक्रवार पूर्ण होने पर आठ बालकों को भोजन कराएँ। उन्हें खीर, पूड़ी, चने आदि खिलाएँ। खटाई बिल्कुल न दें। दक्षिणा देकर विदा करें। ॥ श्री संतोषी माता व्रत कथा समाप्त ॥
Santoshi Mata Vrat Katha Complete
Complete Santoshi Mata Vrat Katha with vrat vidhi, significance, blessings and traditional Friday fasting story.